Monday, 28 January 2013


 स्वतंत्रता सेनानियों  से अनजान देश का युवा वर्ग 


देश ने अपना 64वा गणतंत्र दिवस मना लिया। खूब धूमधाम हुई। सरकारी आयोजनों मे लड्डू भी बाटे गए। अग्रेजो की परंपरा को निभाते हुए कुछ वीआईपी का एट होम कार्यक्रम भी संपन्न हो गया। कह सकते है कि कर्म कांड सारा किया गया। पर उसी दिन शाम को कुछ टीवी चैनल ने यह भी दिखाया कि देश के बहुत से लोग जानते ही नहीं है कि  गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है। इस दिन क्या खास हुआ था जिसके लिए पूरा देश जश्न मे डूबा हुआ है।  एक चैनल ने तो सारा
निशाना पुलिस विभाग पर ही साधा। लगभग एक दर्जन पुलिस वालो से पूछा की
गणतंत्र दिवस क्या होता है ?  गणतंत्र दिवस क्यों मानते है ? लेकिन
दुर्भाग्य से ज्यादातर पुलिस वालो ने इसका उत्तर गलत दिया। यह शर्मनाक है
कि हमारी पुलिस भी इस विषय मे अनजान है। सच यह है कि देश के ज्यादातर
लोगो को देश के महत्वपूर्ण दिनों एवं व्यक्तियों के बारे मई पता ही नहीं
है। इसी दिन मेरे एक दोस्त शुभकामनाये देते हुए 26 जनवरी को 62वा
गणतंत्र दिवस कह रहे थे वही एक अन्य मित्र 63वा स्वतंत्रता दिवस  घोषित
कर दिया। सवाल यह है की इस सबके लिए दोषी किसको माना जाये ? क्या वे
बच्चे जिन्होंने इस दिन का महत्व समझे बिना मिठाई का आनन्द लिया। क्या वे
पुलिसकर्मी जो कार्यक्रम की देखरेख मे तो लगे है पर यह नहीं जानते की
क्या कार्यक्रम हो रहा है ? क्या वे लोग जो रस्म निभाने के लिए बधाई
सन्देश तो दे रहे है, पर इस दिवस की महत्ता से अनभिज्ञ है ? अपने देश मे
वर्ष मे दो-चार दिन ऐसे आते है जब सभी टीवी चैनल देशभक्ति के गीतों का
प्रसारण करते है, स्वतंत्रता सेनानियों का नाम लेते है। परन्तु सास बहु
एवं रियलिटी शो देखने वाली आज की युवा पीड़ी उन महान  स्वतंत्रता
सेनानियों के बारे मे जानना नहीं चाहती। कम से कम युवा पीड़ी के लिए तो
ऐसे कार्यक्रम स्कूल के समय मे दिखाने ही चाहिए, जिससे वो देश के शानदार
इतिहास को जान सके।
अपने देश मे किसी को श्रद्धाजलि देने व किसी का भी जन्मदिन मनाने के लिए
बस छुट्टी कर दी जाती है। कुछ सरकारे वोटबैंक की खातिर हर मजहब के
महापुरुष के जन्म अथवा निर्वाण दिवस पर छुट्टी कर चुनावी लाभ पाने की
असफल कोशिश करते है। जो बच्चे इन विशेष दिनों मे स्कूल नहीं जाते, देश के
जो करोडो कर्मचारी इस छुट्टी के नाम पर घरो मे बैठ जाते है उनका एक फीसदी
भी ऐसा नहीं जो उन महापुरषों के विषय मे जानने का प्रयास करे,जिनके नाम
पर छुट्टी मिलती है।दुनिया के किसी देश मे इतनी छुट्टी नहीं होती है
जितनी भारत मे  होती है।
ज्ञान- विज्ञान के नाम पर आज की युवा पीड़ी काफी कुछ जानती है, पर क्या
कोई विश्वास करेगा की लखनऊ मे पैदा हुआ बच्चा बड़ा होकर उसे ये मालूम हो
कि लखनऊ  के आखिरी नवाब का नाम क्या था ? इस लिए यह जरुरी है कि
महापुरुषो  के जन्मदिन पर छुट्टी संस्कृति को ख़त्म कर देना चाहिए और जिन
महापुरुषो को हम श्रद्धाजलि देना चाहते है उनका जीवन चरित्र देशवासियों को
बताना चाहिए। मेरा मानना है कि देश को आगे ले जाने के लिए छुट्टियों की
छुट्टी कर देनी चाहिए। कम से कम अवकाश और ज्यादा से ज्यादा काम यही देश
को आगे ले जा सकता है।
                                                                                   सुमित गुप्ता


Sunday, 27 January 2013

30 जनवरी: विशेष 

रामराज का मतलब हिन्दुराज नहीं बल्कि ईश्वर का राज: महात्मा गाँधी 

महात्मा गाँधी के जीवन के अनेक प्रेरणादायी रहे है। उनके व्यक्तित्व का
प्रभाव ऐसा था कि वह जहा जाते उनके दर्शनों के लिए अपार भीड़ इक्कठा हो
जाती। 29 मार्च 1918 का दिन था। महात्मा गाँधी ट्रेन से इंदौर पहुचे। वह
अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलेन के आठवे अधिवेशन मे भाग लेने आये
थे।उनके आने की खबर सुन कर इंदौर और आस पास के इलाके के हजारो लोग स्टेशन
पर पहुच गए थे। उन दिनों रेलगाड़ी मे भारतीयों के लिए तीसरे दर्जे के
डिब्बे लगा करते थे। महात्मा गाँधी जी ऐसे ही एक डिब्बे से उतरे। उनके
सिर पर सफ़ेद टोपी थी। बिना बटन का सादा ढीला कुरता और साधारण सी धोती
पहने थे। कंधे पर कम्बल था। इतने साधारण दिखने वाले गाँधी जी को किसी ने
पहचाना ही नहीं लेकिन जेसे ही पहचाना तो 'गाँधी जी की जय' के नारे गूंज
उठे। भीड़ ने उनके दर्शन करने के लिए उन्हें घेर लिया। बड़ी मुश्किल से
उन्हें स्टेशन के वेटिंग रूम तक लाया गया।  स्टेशन के बाहर भी हजारो लोग
उनके दर्शनों के लिए खड़े थे। उन्हें ले जाने के लिए चार घोड़ो वाली बग्घी
तेयार खड़ी थी लेकिन जनता ने घोड़ो को हटा दिया। लोग उस बग्घी को स्वय
खीचना चाहते थे। गाँधी जी ने जनता के इस प्रेम को देखा तो उन्होने बग्घी
पर बैठने से इंकार कर दिया लेकिन तभी नारे गूंज उठे -' गांधीजी को
हाथोहाथ बग्घी से ले जाएगे। आखिर गांधीजी को जनता के प्रेम के आगे झुकना
पड़ा। लोगो ने हाथोहाथ बग्घी को खीचा। फिर आगे जा कर उसमे घोड़े जोत दिए
गए। गाँधी जी देश भर मे घूम घूम कर स्वतंत्रता का अलख जगा रहे थे।
उन्होंने जनता को स्वराज का मंत्र दिया था। सन 1921 मे वह खंडवा गए। वह
लोगो को अपने देश मे बनी वस्तु का प्रयोग करने को कह रहे थे। वहा उनकी
सभा मे चमकीले कपडे पहने हुए कुछ बालिकाओ ने स्वागत गीत गाया। फिर वहा
उपस्थित नेताओ ने गांधीजी को भरोसा दिलाया कि वे हर तरह से स्वदेशी का
प्रचार करेगे। इस पर गांधीजी ने कहा, मुझे अब भी भरोसा ही दिलाया जा रहा
है, जबकि गीत गाने वाली बालिकाओ ने किनारी गोटे वाले विदेशी कपडे पहनकर
मेरा स्वागत किया।मुझे तो स्वदेशी प्रचार खादी के बारे मे दृढ होना
चाहिए।
एक बार एक मारवाड़ी सज्जन गांधीजी से मिलने आए। उन्होंने सिर पर बड़ी सी
पगड़ी बांध रखी थी। गांधीजी बोले, आपके नाम से तो गाँधी टोपी चलती है और
आपका सिर नगा है। ऐसा क्यों ? गांधीजी ने हस कर कहा, बीस आदमियों की टोपी
का कपडा तो आपने अपने सिर पर पहन रखा है। तब उन्नीस आदमी टोपी कहा से
पहनेगे? उन्ही उन्नीस मे से एक मै हु। सन 1929 की बात है। गांधीजी भोपाल
गए। वहा की जनसभा मे उन्होंने समझाया की मै जब कहता हु कि रामराज आना
चाहिए तो उसका मतलब क्या है? रामराज का मतलब हिन्दुराज नहीं है। रामराज
से मेरा  मतलब है ईश्वर का राज। मेरे लिए तो सत्य और सत्यकार्य ही ईश्वर
है। प्राचीन रामराज का आदर्श प्रजातंत्र के आदर्शों से बहुत कुछ मिलता
जुलता है और कहा गया है की रामराज मे दलित आदमी भी कम खर्च मे और थोड़े
समय मे न्याय प्राप्त कर सकता था। यहाँ तक कहा गया है की रामराज मे एक
कुत्ता भी न्याय प्राप्त कर सकता था।


सुमित गुप्ता 



Sunday, 12 September 2010

चुनाव का समय हो ...तो नेताओ को जनता से मिलने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता ...नुक्कड़ नाटक का आयोजन ... रेली ...जनसभा ....वगेरह वरेरह ....और इन सबसे जयादा मुश्किल है ....जनता या कहे ..मतदाताओ को सभा तक लाना ...क्योकि अब वो ज़माना गया ...जब लोग नेताओ कि एक जलक पाने के लिए कोसो दूर से पैदल चल कर आ जाते थे .... घंटो तक इंतज़ार किया करते थे ....लेकिन आज के इस भाग दोड भरी ज़िन्दगी मे तो किसी के पास न तो समय है ....और न वो किसी कि जनसभा मे जाने कि दिलचस्पी रखता है ...ज़ाहिर सी बात है कि राजनितिक दल और उनके नेताओ को अपनी बात मतदाताओ तक पहुचने के लिए अपनी रुन्नीति मे भी बदलाव करना पड़ा ....इसके लिए उनोहोने चुनाव के दोरान पड़ने वाले पर्व मे ज्यादा से ज्यादा भागीदारी करना .... जी हां अगर चुनाव मे के बीच मे कोई बड़ा पर्व आ जाए .... फिर क्या नेताओ का तो आधा कम बन गया ....चाहे जितने बिजी हो ...कही भी कभी भी बड़ा जलसा हो पहुच जाते है ... SUMIT GUPTA

Monday, 19 July 2010

मेरी रेल यात्रा
मै हाल ही मे गोमती एक्सेप्रेस से लखनऊ से नई दिल्ली आ रहा था ...ट्रैन हमेशा की तरह ठसाठस भरी थी बैठना तो दूर खड़े होने के लिए भी जगह न थी शुक्र है की मेरा टिकट बुक था इसलिए मुझे बैठने के लिए सीट मिल गई लेकिन पुरे आठ घंटे मैने केसे गुजरे मे बता नहीं सकता गाड़ी हर जगह पर रूकती सवारी तो कम न होती बल्कि और सवारी चड़ने के लिए एक दूसरे को धक्का देती हुई आगे बदने की कोशिश करती .....
जब गाड़ी इटावा मे पहुची तो एक महिला जिसकी उम्र तक़रीबन ३० साल की थी अपने पांच बच्चो के साथ चड़ी तो चार बच्चे तो लोगो के बीच से निकलते हुए अपने लिए जगह पा ली लेकिन वो महिला जिसके हाथ मे एक बच्चा तथा दूसरे हाथ मे कुछ सामान था वो अपने लिए जगह तलाश रही थी मै उसके चहेरे की बेबशी को काफी देर तक देखता रहा.... उधर दूसरी और यात्री एक दूसरे से लड़ रहे थे ..... ख़ैर गाड़ी चलने दस मिनट तक ये तू तू मै मै चलता रहा फिर सब शांत .....
लेकिन ये द्रश्य मेरी आँखों के सामने रह रह कर आता रहा..... हम बात तो करते है भारत को विकसित देशो के कतार मे खड़ा करने की....आज भारतीय रुपयों का एक प्रतीक चिहन भी बन गया है और हम आईटी. मेडिकल मे अपने आपको एक मजबूत देश मानते है लेकिन क्या वाकई मे हम विकसित देश बन पायेगे ....
किसी भी देश की पहचान वहा की आधारभूत सुविधाओ से होता है आज भी देश की ८०% जनता रेल से यात्रा करती है तो क्यों आजादी के ६२ साल बाद भी हम उन सुविधाओ से वंचित है जिसके हम हक़दार है हर साल रेल मंत्री बजट मे कई रेलगाड़ी चलने की घोश्डा करती है तो कई के फेरे बढाने के लिए कहती है लेकिन हकीकत मे ये सिर्फ घोश्डा बन कर रह जाती है भारतीय रल नेटवर्क अंग्रेजो का बनाया हुआ है आज जिस तेजी से आबादी बढ रही है उस तेजी से रेलवे का विकास नहीं हुआ है ... आजादी के बाद क्या नई रेललाइन बिछाने का कम उस तेजी से हुआ ......आज भी रेल का कम उसी पुरानी तकनिकी से चल रहा है ... इस समय रेल मंत्रालय सिर्फ बाबुओ के भरोसे चल रहा है क्योकि रेल मंत्री ममता बनर्जी आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव मे इतनी व्यस्त है की उनको दिल्ली आने का समय नहीं है वो अपना अधिकाश समय बंगाल मे ही बिताती है .... ये सही है की वो अपनी पार्टी की लीडर है लेकिन इससे रेलवे को कितनी हनी उठानी पड़ रही है ... योजनाए वो अधिकारी बनाते है जिन्होंने कभी भी इन गाडियों में यात्रा नहीं की है और हमारे प्रिये नेता भी हवाई यात्रा को ही ज्यादा तवज्जो देते है यदि गाड़ी से यात्रा करनी भी पड़े तो वो राजधानी जैसी गाडियो का मजा लेते है तो फिर कैसे उनको इसका एहसास होगा की इन गाडियो मे लोगो को किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है यदि वाकई मे रेल मंत्री को आम लोगो की चिंता है तो उनको हर गाड़ी मे जनरल डिब्बो की संख्या बढानी हगी तथा हर १० १५ दिन मे जो रेल हादसे होते है जैसे रेल गाड़ी का पटरी से उतर जाना बम विस्फोट होना आदि तो इसका सबसे बेहतर तरीका है की गाड़ी के आगे एक पायलट ट्रेन को चलाना इससे न सिर्फ बेगुनाह लोग की जन बचेगी बल्कि देश को आर्थिक हनी भी नहीं होगी ....
उदारीकरण के बाद देश मे हर जगह प्राइवेट कम्पनी का प्रवेश बड़े पैमाने पर हुआ है जिससे न सिर्फ लोगो को रोजगार मिला है बल्कि देश का विकास भी हुआ है लेकिन रेलवे मे निजीकरण अभी न के बराबर है ... यदि वाकई मे रेलवे को विकास करना है तो के तहत ही संभव है वर्ना इसी तरह से भारतीय गाड़ी चलती रहेगी .....इंडिया तो आगे बढ जाएगा लेकिन भारत तो पीछे रह जाएगा .....

Thursday, 13 May 2010


साझी विरासत पर कही दाग न लग जाए
अभी कुछ दिन पहले मुझे दिल्ली के चांदनी चोक बाजार जाने का मोका मिला तक़रीबन एक किलोमीटर लम्बे इस बाजार मे मुझे सभी धर्मो के आस्था केंद्र देखने को मिले चाहे वह दिगम्बर जैन लाल मंदिर हो या आर्य समाज मंदिर फतेपुरी माजिद हो या सेण्टर चर्च या सिखों का गुरुद्वरा वहा का नजारा देखकर मुझे अपने ग्रहनगर लखनऊ की याद आ गई... वहा पर भी यदि आप ऐशबाग से हजरतगंज के दो किलोमीटर की दुरी तय करेगे तो आप देखेगे की हिन्दुओ के मंदिर मुस्लिमो का मजिद ओर सिख तथा ईसाईयो के गुरुद्वारा तथा चर्च मिल जाएगे ....लखनऊ मे हिन्दू मुस्लिम भाईचारा हमेशा से बना हुआ है वहा पर कभी भी कोई बड़ा धार्मिक दंगे नहीं हुए दरअसल हमारी सस्कृति मिलीजुली गंगा जमुनी वाली रही है ओर हम सदा से ही यहाँ एक दूसरे के साथ रहते चले आए है चाहे मुस्लमान हो या हिन्दू दोनों ने एक दूसरे का हिन्दू दोनों ने एक दूसरे का साथ दिया है
हालत चाहे जैसे भी हो हा कभी कभार लोगो पर जूनून भारी पड़ जाता है मगर खुदा का शुक्र है की वह ज्यादा दिनों तक नहीं रहता कहा जाता है आजादी से पूर्व बंगाल मे दुर्गा पूजा के अवसर पर मुस्लिम किसान इन आयोजनों मे बड़ी धूमधाम से शामिल हुआ करते थे कोलकाता मे दुर्गा पूजा मे ओर मुंबई मे गणेश्त्सव पर आज भी दोनों समुदाय को साथ साथ देखा जा सकता है लखनऊ मे आज भी मुहेरम के मोके पर ताजियों के जुलुस मे मुस्लिमो के साथ साथ हिन्दू भाइयो की भी शिरकत होती है आजमेर के ख्वाजा चिस्ती के बारे मे कोंन नहीं जनता उनकी दरगाह पर माथा टेकने वालो मे मुसलमानों से कही अधिक गैर मुस्लिम होते है
भारत मे धर्म को लेकर हमेशा कुछ न कुछ चलता ही रहता है धर्म एक निजी मामला है यह आस्था का सवाल है ओर जहा आस्था का मामला होता है वहा विज्ञानं भी कुछ नहीं क़र सकता लेकिन दुर्भाग्य से समाज के कुछ ठेकेदार है जिनका काम ही दंगे भड़काना है हमें ऐसे दूषित मानसिकता से बचना होगा क्योकि हमारी सस्कृति कहती है की हम तो सदा से ही मिलजुल क़र रहने वाले लोग है .........

तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख .......
एस एच कपाडिया ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के पद के रूप में शपथ ले ली... इसी के साथ उनके उपर एक नई जिम्मेदारी आ गई... क्योकि पिछले कई दिनों से न्यायपालिका के उपर कई तरह के आरोप लगे है चाहे वह दिनाकरण का मामला हो ,न्यायपालिका को आरटीई के दयारे में लाने का मामला हो या फिर भ्रस्टाचार... आज न्याय को लेकर भारतीयों के मन से भरोसा हिल रहा है इसका कारण है यह की नयाय मिलने मे देरी ....आज किसी भी मुद्दे पर फ़ेसला आने मे सालोसाल लग जाते है यह नयाय न मिलने के बराबर है अदालतों मे लगभग तीन करोर मामले लंबित है १५ १५ साल तक निर्णय के लिए प्रतीचा करना पड़ता है... हत्या के कुछ मामले मे सुनवाई हुए एक दशक हो जाने पर भी फ़ेसला नहीं मिलता अभी हाल ही मे कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने १५००० रिटायर जजों ओर उन लोगो की नियुक्ति सम्बन्धी एक योजना को मंजूरी दे दी है जो लंबित मामलों को निपटा सके.... इसके बावजूद बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा की फेसले कितने जल्दी आते है... उन हथकंडो मे ही बहुत सा समय व्यर्थ हो जाता है क्योकि निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्य न्यायालय तक एक लम्बी क़ानूनी प्रक्रिया है इसमे से कुछ तो इतनी जटिल है की किसी मुद्दे पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक केस ट्रान्सफर हो जाता है.... इनमे से कुछ प्रमुख मुद्दे है जैसे बाबरी माजिद , १९८४ के दंगे ,कावेरी जल विवाद.... यदि सही मायने मे इस दिशा मे काम करना है तो न्यायक सुधार की सख्त जरुरत है
नये मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल मे कुछ ऐसा करे जिससे न्यायपालिका मे सुधार की आशा की जा सके ये पहल खुद न्यायपालिका को ही करना है की उसकी प्रतिष्ठा को कैसे बचाया जा सके ये सविंधान के लिए भी उपयुक्त होगा की न्यायपालिका मे बाहरी हस्तछेप न के बराबर हो नहीं तो मुझे हिंदी फिल्म दामनी का वो डायलोग याद आता है जिसमे सनी देयोल कहता है की तारीख पे तारीख , तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख .......

Saturday, 1 May 2010

मई दिवस या सिर्फ दिवस
आज दुनिया भर मे एक मई श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है लेकिन ये बहुत दुःख की बात है की विकास की धुरी कहे जाने वाले श्रमिक बेबस ओर लाचार है उनकी स्थति अत्यंत दयानिये है वे मोलिक अवश्क्ताओ से भी वंचित है... २००१ की जनगणना के अनुसार देश में श्रमिको की संख्या करीब ४० करोर है जिनमे से ३१.३ करोर मुख्य श्रमिक है ओर ८.९ करोर सीमांत श्रमिक ...... ...नेशनल संपेल रिसर्च के अनुसार संगठित ओर असंगठित दोनों चैत्रो मे कुल ८.९ करोर लोग है इनमे से लगभग २.६ करोर संगठित चेत्र मे ओर शेष ४३.३ करोर असंगठित चेत्र में है असंगठित श्रमिको से मेरा मतलब उन लोगो से है जो दो वक़्त की रोटी के लिए वो सब काम करते है जो उनको मिल जाता है खेतिहर ,मजदूर रिक्शाचालक, निर्माण मजदूर, छोटे किसान, नोकर आदि असंगठित श्रेणी के श्रमिको मे गिने जाते है.... देश के विकास ओर उनन्ती में गेर संगठित श्रमिको का योगदान इस तथ्य से लगाया जा सकता है की देश के जीडीपी का करीब ६० प्रतिशत गेर संगठित चेत्र में है सिचाई, बिजली परियोजनाओ के निर्माण समेत शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहा इन लोगो का श्रम न लगा हो लेकिन इनके हितो की चिंता न तो सरकार को है न उद्योग जगत को वैसे तो सरकार ने श्रमिको के कल्याण के लिए अनेक योजनाए शुरू की है लेकिन श्रमिको की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है .....गेरसंगठित श्रमिको के हितो को धयान में रखते हुए सरकार ने असंगठित सेक्टर कामगार सामाजिक सुरछा बिल २००८ पास किया था इसका लाभ गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले २३ करोर भूमिहीनों मजदूरो को मिलना था.... पिछले कुछ वर्षो में असंगठित चेत्र के श्रमिको की स्थति के लिए कई आयोग बने तथा इन सभी ने श्रमिको की स्थति ख़राब बताई तथा सरकार से उन लोगो पर विशेष धयान देने को कहा..... रिपोर्ट में ये भी कहा गया है की इन लोगो के न तो काम करने के घटे तय है ओर न ही उनको पूरी मजदूरी दी जाती है देश के करीब ३८ करोर असंगठित कामगारों का जीवन स्तर बद से बदतर है इसलिए सरकार ओर साथ ही साथ उद्योग जगत को ये सोचना चाहिए की इन लोगो के जीवन स्तर को कैसे उपर उठाया जाए तभी मई दिवस बनाना सार्थक होगा अन्यथा ...............