Monday, 26 August 2013

 भगवा लहर पैदा करने की कोशिश

इसे संयोग कहें या समय का फेर अथवा फिर इतिहास का खुद को दोहराना, पर आज की अनेक घटनाएं भारत को नब्बे के दशक में घसीट कर ले जा रही हैं। ये घटनाएं आर्थिक परिस्थितियों से लेकर फिल्म जगत और भारत के पास-पड़ोस के कालकम से जुड़ी हैं और आज वही हो रहा है जो कभी नब्ब के दशक में हो चुका है।  कहते हैं जो लोग इतिहास भूल जाते हैं, उन्हें इतिहास को फिर से दोहराना पड़ता है। क्या यही कहावत तो भारत के सामने साकार नहीं हो रही है।
लगभग 23 साल बाद फिर ‘राम’ के नाम पर भगवा लहर पैदा करने की कोशिश हो रही है. हमें याद है वर्ष 1990 में अयोध्या में कारसेवा के नाम पर धार्मिक भावनाओं को उभारकर दक्षिण भारत सहित अन्य अनेक हिंदीभाषी राज्यों से कारसेवकों को अयोध्या बुलाया गया था. उस दौरान आडवाणी की रथयात्रा ने आग में घी डालने का काम किया था. फलत: किसी अनहोनी से बचने के लिए सरकार ने काफी सख्ती की थी, जिसकी बहुसंख्यकों हिंदुओं में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. परिणामस्वरूप भाजपा के पक्ष में बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण हुआ था. इस बार भी कुछ वैसा ही खतरनाक खेल खेलने की कोशिश है.
ऐसे में सरकार को विहिप के इस कार्यक्रम को भोथरा करने के लिए चतुराई का परिचय देना होगा. उसे विहिप को प्रतिक्रिया का कोई मौका नहीं देना होगा. परिक्रमा मार्ग से सटे गांवों में बाहरी राज्यों से आए लोगों को जुटने नहीं देना चाहिए. साथ ही बहुसंख्यकों को यह समझाने की कोशिश होनी चाहिए कि विहिप राममंदिर निर्माण को लेकर उतनी आतुर नहीं है, जितनी उसे भाजपा को केंद्र की सत्ता में देखने की ललक है. सरकार के अलावा धर्मनिरपेक्ष लोगों को भी एकजुट होकर विहिप के इस धार्मिक आंदोलन के सच से जनता को अवगत कराना चाहिए ताकि इसे जनसमर्थन न मिल सके और सामाजिक समरसता को बिगड़ने से रोका जा सके.
संघ ने पिछले दिनों जिस तरह सारे विरोधों को दरकिनार कर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान की कमान सौंपी थी, उससे लग गया था कि चुनाव से पूर्व वह ‘राममंदिर’ निर्माण का धार्मिक कार्ड खोलेगा. हुआ भी वैसा ही. मोदी के कहने पर उनके साथी किंतु दागी अमित शाह को उप्र का प्रभार सौंपा गया. उन्होंने इस नई जिम्मेदारी के साथ ही राममंदिर का राग अलापना शुरू कर दिया था. मोदी को कट्टर हिंदूवादी चेहरा माना जाता है. वह इसे बनाए रखना चाहते हैं और उसे वह अपनी सियासी ताकत मानते हैं. इसीलिए 2014 के आम चुनाव में भाजपा धार्मिक कार्ड खेलने जा रही है. संघ और भाजपा के कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि किसी अन्य मुद्दों के  सहारे भाजपा के पक्ष में देशव्यापी लहर पैदा नहीं की जा सकती. धार्मिक एजेंडा ही इसके लिए आसान राह है.
यद्यपि मोदी अपने भाषणों में गुजरात के विकास मॉडल की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं किंतु संघ को ‘विकास’ के सवाल पर किसी चुनावी करिश्मे की उम्मीद नहीं है. यद्यपि देश में विकास के नाम पर राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ है. बिहार की जदयू सरकार इसका उदाहरण है. इतना ही नहीं, भाजपा की मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारें विकास कार्यक्रमों के सहारे ही सत्ता में है. दिल्ली में शीला दीक्षित की कामयाबी के पीछे विकास की ही राजनीति है. फिर राजनीतिक दल नीतियों और कार्यक्रमों के सहारे चुनावों में जाने से क्यों डरते हैं? सच यह है कि राजनीतिक दलों का मानस बन गया है कि ‘विकास’ के नाम पर वोट नहीं मिलता.
नेताओं के एक बड़े वर्ग का मत है कि वोट जाति, धर्म, संप्रदाय और क्षेत्रवाद के नाम पर ही मिलता है. इसीलिए चुनाव से पहले राजनीतिक दल जो कुछ भी कहें किंतु चुनाव आते-आते चुनाव की धुरी इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है. असल सवाल पीछे छूट जाते हैं. इस बार भी भाजपा सत्तारूढ़ कांग्रेस की नाकामियों को जनता के बीच ले जाने की जगह धर्म की आंधी चलाने की कोशिश में है. यह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए अशुभ संकेत है.
भाजपा को देश का मानस समझना चाहिए. आज का युवा मतदाता काफी जागरूक है. अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक युवाओं के समक्ष बेहतर शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार की चुनौती है. वे देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था तथा महंगाई को लेकर चिंतित हैं. उन्हें पता है कि सामाजिक कटुता और सांप्रदायिकता का दंश देश को  खोखला करेगा. वे सुरक्षित समाज में अमन से रहना चाहते हैं. ऐसे में भाजपा को अतिवाद की यह राजनीति उसे उल्टी पड़ सकती है.
वैसे भाजपा से देश के युवा और मध्यवर्ग को चुनाव में घिसे-पिटे मुद्दों से अलग हटकर नई शुरुआत की उम्मीद थी. वह इसीलिए मोदी के प्रति आकषिर्त भी था. किंतु संघ ने जन का मन समझे बगैर जो धार्मिक कार्ड खेला है, उससे मतदाताओं में निराशा हुई है. ऐसे में बहुसंख्यकों को संयम और बड़े मन का परिचय देना होगा. एक बार वे फिर कसौटी पर हैं. समाज के अन्य सभी वर्गों के लोग उनकी तरफ देख रहे हैं. इसलिए विहिप के राजनीति प्रेरित ऐसे कार्यक्रमों को सहयोग और समर्थन नहीं मिलना चाहिए. यदि कहीं भावना में बहकर कोई चूक हुई तो वह बड़ी त्रासदी होगी. यह देश के लिए कतई शुभ नहीं होगा.
सुमित गुप्ता

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