छह दशक लंबे संघर्ष का नाम है तेलंगाना
आखिर तेलंगाना राज्य के सृजन की घोषणा हो ही गई। इस पिछड़े क्षेत्र के लोगों का 60 वर्ष पुराना सपना साकार हो गया है जबकि समृद्ध आंध्र क्षेत्र को इससे नुक्सान हुआ है। कई वर्षों तक डगमगाने के बाद कांग्रेस पार्टी ने भारी जोखिम उठाया लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि भारत के इस 29वें राज्य के सृजन से क्या समस्या हल हो जाएगी? लगता तो ऐसे है कि कांग्रेस के सामने कई और समस्याएं मुंह बाए खड़ी हो जाएंगी।
आंध्र प्रदेश भाषायी आधार पर गठित किया जाने वाला देश का प्रथम राज्य था जो 1953 में तत्कालीन मद्रास प्रैजीडैंसी में से काटकर बनाया गया था। इसकी राजधानी कुरनूल थी। 1956 में जब राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ तो हैदराबाद रियासत और आंध्र राज्य को मिलाकर नवम्बर 1956 में वर्तमान आंध्र प्रदेश अस्तित्व में आया। अब देश का 29वां राज्य तेलंगाना इसमें से काटकर सृजित करने का प्रस्ताव है।
बेशक छोटे राज्य का सृजन एक अच्छी बात है लेकिन तेलंगाना पर फैसला एक जुआ ही है जो दूरदृष्टिविहीन निर्णय सिद्ध हो सकता है। कांग्रेस मुख्य तौर पर यह मानकर चल रही है कि 2014 के चुनाव में होने वाले नुक्सान की अन्य ढंगों से भरपाई कर लेगी। पार्टी को आस है कि प्रस्तावित तेलंगाना राज्य में यदि टी.आर.एस. प्रमुख चंद्रशेखर राव अपने वायदे के अनुसार अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लेते हैं तो 17 लोकसभा सीटों में से यह 15 सीटे जीत जाएगी। लेकिन लगता तो ऐसा है कि यह आंध्र प्रदेश की सभी की सभी 42 सीटों से हाथ धो बैठेगी। जहां तक विधानसभा सीटों का सवाल है आंध्र में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो जाएगा। हालांकि यह लंबे समय से पार्टी का गढ़ चला आ रहा है।
देखने को तो बेशक तेलंगाना क्षेत्र में बहुत जश्न मनाया जा रहा है लेकिन इस नव सृजित राज्य में भी कांग्रेस पार्टी, यू.पी.ए. सरकार और राज्य सरकार को अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करना होगा। ये चुनौतियां आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही प्रकार की होंगी।
जो राजनीतिक उथल-पुथल दस्तक दे रही है वह कांग्रेस के लिए बहुत महंगी सिद्ध हो सकती है। जैसा कि 60 और 70 के दशक में तेलंगाना और आंध्र आंदोलनों के दौरान हुए टकरावों में हम देख चुके हैं, अब की बार भी जबरदस्त राजनीतिक प्रतिरोध हो सकता है। फिलहाल एकीकृत आंध्र प्रदेश के समर्थक गुस्से में उबल रहे हैं जो हिंसा में परिवर्तित हो सकता है।
हिंसा का पूर्वाभास करते हुए केन्द्र सरकार ने पहले ही यहां अधिक सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं। कोई भी दावे से नहीं कह सकता कि रोष प्रदर्शन क्या दिशा धारण करेंगे। स्वार्थी हितों वाले लोग किसी भी क्षण इस आंदोलन में कूद सकते हैं जो आग में घी का काम करेंगे। आंध्र क्षेत्र के अमीर निवेशकों द्वारा रोष प्रदर्शनों का समर्थन करने का एक कारण यह है कि अंततोगत्वा आंध्र प्रदेश के हाथों से हैदराबाद निकल जाना है। यदि हिंसा फैलती है तो इसकी परिणति अमन-कानून की समस्या और परिणामस्वरूप राष्ट्रपति शासन लागू होने में हो सकती है।
दूसरी बात यह कि तेलंगाना के सृजन का अन्य राज्यों पर प्रभाव बहुत चिंताजनक हो सकता है क्योंकि देश के कई भागों में आंदोलन शुरू हो जाएंगे। आंध्र प्रदेश में ही रायलसीमा क्षेत्र के लोगों ने तेलंगाना फैसले से प्रभावित होकर अलग राज्य की मांग शुरू कर दी है। पश्चिम बंगाल में गोरखा लैंड आंदोलन दोबारा शुरू हो गया है। असम में बोडोलैंड की मांग फिर जोर पकड़ गई है। कांग्रेस कार्य समिति के मुकुल वासनिक जैसे सदस्यों ने अलग विदर्भ राज्य की मांग उठाई है।
उधर नागर विमानन मंत्री अजित सिंह हरित प्रदेश की लंबे समय से स्थगित अपनी मांग फिर से उठा सकते है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी तेलंगाना फैसले से प्रेरित होकर उत्तर प्रदेश को 4 राज्यों में बांटने की मांग जोर-शोर से उठाएंगी। इसी प्रकार सौराष्ट्र, कच्छ, लद्दाख एवं कई अन्य छोटे राज्यों के लिए मांग उठेगी। इन मांगों से निपटने का एक तरीका यह है कि केन्द्र सरकार छोटे राज्यों के सृजन के पूरे मुद्दे पर चिंतन-मनन करने के लिए नए सिरे से राज्य पुनर्गठन आयोग स्थापित करे क्योंकि कांग्रेस ने तेलंगाना फैसले से भानुमति का पिटारा खोल दिया है।
तीसरा मुद्दा है आर्थिक चुनौतियों और नवसृजित आंध्र एवं तेलंगाना के बीच सम्पत्तियों के बटवारे का। दोनों ही राज्यों के लोगों का भाग्य प्रभावित होगा। आंध्र प्रदेश का वर्चस्व समाप्त होने वाला है। संयुक्त आंध्र प्रदेश के पक्षधर छाती ठोक कर दावा करते रहे हैं कि प्रदेश सरकार गरीबी की दर 9.2 प्रतिशत तक लाने में सफल रही है जोकि राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है।
हैदराबाद को लेकर अनेक चिंताएं हैं जिनका पूरी तरह निवारण होना बाकी है। रियल एस्टेट को लेकर भी चिंताएं हैं क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता से इनकी कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है। क्या हैदराबाद में नया विदेशी निवेश हो पाएगा? क्या तेलंगाना सृजित होने के बाद भी यह सूचना टैक्नोलॉजी कम्पनियों का गढ़ बना रहेगा? इन सवालों का अभी तक कोई जवाब नहीं मिला।
चौथी समस्या यह है कि छोटे राज्यों के पक्ष में हवा तो चल रही है लेकिन इसमें राजनीतिक अस्थिरता का खतरा भी छिपा हुआ है। पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे राज्यों में लंबे समय से हम यह स्थिति देख रहे हैं। क्या तेलंगाना का सृजन क्षेत्रवाद को मजबूत करेगा एवं राजनीतिक तंत्र को कमजोर करेगा?
यदि विकास की बात करें तो हम देखते हैं कि झारखंड, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के बहुत से राज्यों की कारगुजारी संतोषजनक नहीं जबकि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य खूब फल-फूल रहे हैं। यह तेलंगाना पर निर्भर करता है कि उसने कौन से रास्ते का अनुसरण करना है।
पांचवीं आशंका है कि नक्सलवादियों से भरा पड़ा तेलंगाना क्षेत्र पूरी तरह उनके हाथों में जा सकता है। संयुक्त आंध्र प्रदेश के पक्षधरों ने भी जो दलीलें दी हैं उनमें यह प्रमुख है। देश के तीसरे हिस्से में पहले ही नक्सलियों का प्रभाव है। वैसे यदि नक्सली मुख्यधारा में आने और चुनाव लडऩे का फैसला करते हैं तो यह एक शुभ शकुन ही होगा लेकिन वे खतरनाक भी सिद्ध हो सकते हैं।
तेलंगाना अब क्योंकि एक वास्तविकता बन गया है इसलिए भविष्य के मद्देनजर उन नेताओं पर भारी जिम्मेदारी आ गई है जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया। उन्हें लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरना होगा और राज्य को आगे ले जाना होगा। उन्हें सभी को साथ लेकर चलते हुए दृढ़ता से नए राज्य का विकास करना होगा। जहां तक वर्तमान वास्तविकता की बात है कोई भी ऐसा दूरदर्शी नेता दिखाई नहीं देता जो इस पैमाने पर पूरा उतर सके। तेलंगाना क्षेत्र में कांग्रेस के पास कोई प्रभावी नेता नहीं जबकि टी.आर.एस. में इसके प्रमुख चंद्रशेखर के बेटे, बेटी और भतीजे का ही वर्चस्व है।
कांग्रेस पार्टी ने बहुत जोखिम उठाते हुए तेलंगाना राज्य का सृजन करने का फैसला किया है लेकिन इसका तात्कालिक कारण चुनावी लाभ लेना ही है। फौरी तौर पर कांग्रेस यही सोच रही है कि आंध्र प्रदेश में जनाधार खिसकने के रूप में उसे जो नुक्सान हुआ है तेलंगाना का दाव खेलकर किसी हद तक उसकी भरपाई की जा सके।
आखिर तेलंगाना राज्य के सृजन की घोषणा हो ही गई। इस पिछड़े क्षेत्र के लोगों का 60 वर्ष पुराना सपना साकार हो गया है जबकि समृद्ध आंध्र क्षेत्र को इससे नुक्सान हुआ है। कई वर्षों तक डगमगाने के बाद कांग्रेस पार्टी ने भारी जोखिम उठाया लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि भारत के इस 29वें राज्य के सृजन से क्या समस्या हल हो जाएगी? लगता तो ऐसे है कि कांग्रेस के सामने कई और समस्याएं मुंह बाए खड़ी हो जाएंगी।
आंध्र प्रदेश भाषायी आधार पर गठित किया जाने वाला देश का प्रथम राज्य था जो 1953 में तत्कालीन मद्रास प्रैजीडैंसी में से काटकर बनाया गया था। इसकी राजधानी कुरनूल थी। 1956 में जब राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ तो हैदराबाद रियासत और आंध्र राज्य को मिलाकर नवम्बर 1956 में वर्तमान आंध्र प्रदेश अस्तित्व में आया। अब देश का 29वां राज्य तेलंगाना इसमें से काटकर सृजित करने का प्रस्ताव है।
बेशक छोटे राज्य का सृजन एक अच्छी बात है लेकिन तेलंगाना पर फैसला एक जुआ ही है जो दूरदृष्टिविहीन निर्णय सिद्ध हो सकता है। कांग्रेस मुख्य तौर पर यह मानकर चल रही है कि 2014 के चुनाव में होने वाले नुक्सान की अन्य ढंगों से भरपाई कर लेगी। पार्टी को आस है कि प्रस्तावित तेलंगाना राज्य में यदि टी.आर.एस. प्रमुख चंद्रशेखर राव अपने वायदे के अनुसार अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लेते हैं तो 17 लोकसभा सीटों में से यह 15 सीटे जीत जाएगी। लेकिन लगता तो ऐसा है कि यह आंध्र प्रदेश की सभी की सभी 42 सीटों से हाथ धो बैठेगी। जहां तक विधानसभा सीटों का सवाल है आंध्र में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो जाएगा। हालांकि यह लंबे समय से पार्टी का गढ़ चला आ रहा है।
देखने को तो बेशक तेलंगाना क्षेत्र में बहुत जश्न मनाया जा रहा है लेकिन इस नव सृजित राज्य में भी कांग्रेस पार्टी, यू.पी.ए. सरकार और राज्य सरकार को अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करना होगा। ये चुनौतियां आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही प्रकार की होंगी।
जो राजनीतिक उथल-पुथल दस्तक दे रही है वह कांग्रेस के लिए बहुत महंगी सिद्ध हो सकती है। जैसा कि 60 और 70 के दशक में तेलंगाना और आंध्र आंदोलनों के दौरान हुए टकरावों में हम देख चुके हैं, अब की बार भी जबरदस्त राजनीतिक प्रतिरोध हो सकता है। फिलहाल एकीकृत आंध्र प्रदेश के समर्थक गुस्से में उबल रहे हैं जो हिंसा में परिवर्तित हो सकता है।
हिंसा का पूर्वाभास करते हुए केन्द्र सरकार ने पहले ही यहां अधिक सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं। कोई भी दावे से नहीं कह सकता कि रोष प्रदर्शन क्या दिशा धारण करेंगे। स्वार्थी हितों वाले लोग किसी भी क्षण इस आंदोलन में कूद सकते हैं जो आग में घी का काम करेंगे। आंध्र क्षेत्र के अमीर निवेशकों द्वारा रोष प्रदर्शनों का समर्थन करने का एक कारण यह है कि अंततोगत्वा आंध्र प्रदेश के हाथों से हैदराबाद निकल जाना है। यदि हिंसा फैलती है तो इसकी परिणति अमन-कानून की समस्या और परिणामस्वरूप राष्ट्रपति शासन लागू होने में हो सकती है।
दूसरी बात यह कि तेलंगाना के सृजन का अन्य राज्यों पर प्रभाव बहुत चिंताजनक हो सकता है क्योंकि देश के कई भागों में आंदोलन शुरू हो जाएंगे। आंध्र प्रदेश में ही रायलसीमा क्षेत्र के लोगों ने तेलंगाना फैसले से प्रभावित होकर अलग राज्य की मांग शुरू कर दी है। पश्चिम बंगाल में गोरखा लैंड आंदोलन दोबारा शुरू हो गया है। असम में बोडोलैंड की मांग फिर जोर पकड़ गई है। कांग्रेस कार्य समिति के मुकुल वासनिक जैसे सदस्यों ने अलग विदर्भ राज्य की मांग उठाई है।
उधर नागर विमानन मंत्री अजित सिंह हरित प्रदेश की लंबे समय से स्थगित अपनी मांग फिर से उठा सकते है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी तेलंगाना फैसले से प्रेरित होकर उत्तर प्रदेश को 4 राज्यों में बांटने की मांग जोर-शोर से उठाएंगी। इसी प्रकार सौराष्ट्र, कच्छ, लद्दाख एवं कई अन्य छोटे राज्यों के लिए मांग उठेगी। इन मांगों से निपटने का एक तरीका यह है कि केन्द्र सरकार छोटे राज्यों के सृजन के पूरे मुद्दे पर चिंतन-मनन करने के लिए नए सिरे से राज्य पुनर्गठन आयोग स्थापित करे क्योंकि कांग्रेस ने तेलंगाना फैसले से भानुमति का पिटारा खोल दिया है।
तीसरा मुद्दा है आर्थिक चुनौतियों और नवसृजित आंध्र एवं तेलंगाना के बीच सम्पत्तियों के बटवारे का। दोनों ही राज्यों के लोगों का भाग्य प्रभावित होगा। आंध्र प्रदेश का वर्चस्व समाप्त होने वाला है। संयुक्त आंध्र प्रदेश के पक्षधर छाती ठोक कर दावा करते रहे हैं कि प्रदेश सरकार गरीबी की दर 9.2 प्रतिशत तक लाने में सफल रही है जोकि राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है।
हैदराबाद को लेकर अनेक चिंताएं हैं जिनका पूरी तरह निवारण होना बाकी है। रियल एस्टेट को लेकर भी चिंताएं हैं क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता से इनकी कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है। क्या हैदराबाद में नया विदेशी निवेश हो पाएगा? क्या तेलंगाना सृजित होने के बाद भी यह सूचना टैक्नोलॉजी कम्पनियों का गढ़ बना रहेगा? इन सवालों का अभी तक कोई जवाब नहीं मिला।
चौथी समस्या यह है कि छोटे राज्यों के पक्ष में हवा तो चल रही है लेकिन इसमें राजनीतिक अस्थिरता का खतरा भी छिपा हुआ है। पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे राज्यों में लंबे समय से हम यह स्थिति देख रहे हैं। क्या तेलंगाना का सृजन क्षेत्रवाद को मजबूत करेगा एवं राजनीतिक तंत्र को कमजोर करेगा?
यदि विकास की बात करें तो हम देखते हैं कि झारखंड, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के बहुत से राज्यों की कारगुजारी संतोषजनक नहीं जबकि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य खूब फल-फूल रहे हैं। यह तेलंगाना पर निर्भर करता है कि उसने कौन से रास्ते का अनुसरण करना है।
पांचवीं आशंका है कि नक्सलवादियों से भरा पड़ा तेलंगाना क्षेत्र पूरी तरह उनके हाथों में जा सकता है। संयुक्त आंध्र प्रदेश के पक्षधरों ने भी जो दलीलें दी हैं उनमें यह प्रमुख है। देश के तीसरे हिस्से में पहले ही नक्सलियों का प्रभाव है। वैसे यदि नक्सली मुख्यधारा में आने और चुनाव लडऩे का फैसला करते हैं तो यह एक शुभ शकुन ही होगा लेकिन वे खतरनाक भी सिद्ध हो सकते हैं।
तेलंगाना अब क्योंकि एक वास्तविकता बन गया है इसलिए भविष्य के मद्देनजर उन नेताओं पर भारी जिम्मेदारी आ गई है जिन्होंने इसके लिए संघर्ष किया। उन्हें लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरना होगा और राज्य को आगे ले जाना होगा। उन्हें सभी को साथ लेकर चलते हुए दृढ़ता से नए राज्य का विकास करना होगा। जहां तक वर्तमान वास्तविकता की बात है कोई भी ऐसा दूरदर्शी नेता दिखाई नहीं देता जो इस पैमाने पर पूरा उतर सके। तेलंगाना क्षेत्र में कांग्रेस के पास कोई प्रभावी नेता नहीं जबकि टी.आर.एस. में इसके प्रमुख चंद्रशेखर के बेटे, बेटी और भतीजे का ही वर्चस्व है।
कांग्रेस पार्टी ने बहुत जोखिम उठाते हुए तेलंगाना राज्य का सृजन करने का फैसला किया है लेकिन इसका तात्कालिक कारण चुनावी लाभ लेना ही है। फौरी तौर पर कांग्रेस यही सोच रही है कि आंध्र प्रदेश में जनाधार खिसकने के रूप में उसे जो नुक्सान हुआ है तेलंगाना का दाव खेलकर किसी हद तक उसकी भरपाई की जा सके।
सुमित गुप्ता


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