स्वतंत्रता सेनानियों से अनजान देश का युवा वर्ग
देश ने अपना 64वा गणतंत्र दिवस मना लिया। खूब धूमधाम हुई। सरकारी आयोजनों मे लड्डू भी बाटे गए। अग्रेजो की परंपरा को निभाते हुए कुछ वीआईपी का एट होम कार्यक्रम भी संपन्न हो गया। कह सकते है कि कर्म कांड सारा किया गया। पर उसी दिन शाम को कुछ टीवी चैनल ने यह भी दिखाया कि देश के बहुत से लोग जानते ही नहीं है कि गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है। इस दिन क्या खास हुआ था जिसके लिए पूरा देश जश्न मे डूबा हुआ है। एक चैनल ने तो सारा
निशाना पुलिस विभाग पर ही साधा। लगभग एक दर्जन पुलिस वालो से पूछा की
गणतंत्र दिवस क्या होता है ? गणतंत्र दिवस क्यों मानते है ? लेकिन
दुर्भाग्य से ज्यादातर पुलिस वालो ने इसका उत्तर गलत दिया। यह शर्मनाक है
कि हमारी पुलिस भी इस विषय मे अनजान है। सच यह है कि देश के ज्यादातर
लोगो को देश के महत्वपूर्ण दिनों एवं व्यक्तियों के बारे मई पता ही नहीं
है। इसी दिन मेरे एक दोस्त शुभकामनाये देते हुए 26 जनवरी को 62वा
गणतंत्र दिवस कह रहे थे वही एक अन्य मित्र 63वा स्वतंत्रता दिवस घोषित
कर दिया। सवाल यह है की इस सबके लिए दोषी किसको माना जाये ? क्या वे
बच्चे जिन्होंने इस दिन का महत्व समझे बिना मिठाई का आनन्द लिया। क्या वे
पुलिसकर्मी जो कार्यक्रम की देखरेख मे तो लगे है पर यह नहीं जानते की
क्या कार्यक्रम हो रहा है ? क्या वे लोग जो रस्म निभाने के लिए बधाई
सन्देश तो दे रहे है, पर इस दिवस की महत्ता से अनभिज्ञ है ? अपने देश मे
वर्ष मे दो-चार दिन ऐसे आते है जब सभी टीवी चैनल देशभक्ति के गीतों का
प्रसारण करते है, स्वतंत्रता सेनानियों का नाम लेते है। परन्तु सास बहु
एवं रियलिटी शो देखने वाली आज की युवा पीड़ी उन महान स्वतंत्रता
सेनानियों के बारे मे जानना नहीं चाहती। कम से कम युवा पीड़ी के लिए तो
ऐसे कार्यक्रम स्कूल के समय मे दिखाने ही चाहिए, जिससे वो देश के शानदार
इतिहास को जान सके।
अपने देश मे किसी को श्रद्धाजलि देने व किसी का भी जन्मदिन मनाने के लिए
बस छुट्टी कर दी जाती है। कुछ सरकारे वोटबैंक की खातिर हर मजहब के
महापुरुष के जन्म अथवा निर्वाण दिवस पर छुट्टी कर चुनावी लाभ पाने की
असफल कोशिश करते है। जो बच्चे इन विशेष दिनों मे स्कूल नहीं जाते, देश के
जो करोडो कर्मचारी इस छुट्टी के नाम पर घरो मे बैठ जाते है उनका एक फीसदी
भी ऐसा नहीं जो उन महापुरषों के विषय मे जानने का प्रयास करे,जिनके नाम
पर छुट्टी मिलती है।दुनिया के किसी देश मे इतनी छुट्टी नहीं होती है
जितनी भारत मे होती है।
ज्ञान- विज्ञान के नाम पर आज की युवा पीड़ी काफी कुछ जानती है, पर क्या
कोई विश्वास करेगा की लखनऊ मे पैदा हुआ बच्चा बड़ा होकर उसे ये मालूम हो
कि लखनऊ के आखिरी नवाब का नाम क्या था ? इस लिए यह जरुरी है कि
महापुरुषो के जन्मदिन पर छुट्टी संस्कृति को ख़त्म कर देना चाहिए और जिन
महापुरुषो को हम श्रद्धाजलि देना चाहते है उनका जीवन चरित्र देशवासियों को
बताना चाहिए। मेरा मानना है कि देश को आगे ले जाने के लिए छुट्टियों की
छुट्टी कर देनी चाहिए। कम से कम अवकाश और ज्यादा से ज्यादा काम यही देश
को आगे ले जा सकता है।
गणतंत्र दिवस क्या होता है ? गणतंत्र दिवस क्यों मानते है ? लेकिन
दुर्भाग्य से ज्यादातर पुलिस वालो ने इसका उत्तर गलत दिया। यह शर्मनाक है
कि हमारी पुलिस भी इस विषय मे अनजान है। सच यह है कि देश के ज्यादातर
लोगो को देश के महत्वपूर्ण दिनों एवं व्यक्तियों के बारे मई पता ही नहीं
है। इसी दिन मेरे एक दोस्त शुभकामनाये देते हुए 26 जनवरी को 62वा
गणतंत्र दिवस कह रहे थे वही एक अन्य मित्र 63वा स्वतंत्रता दिवस घोषित
कर दिया। सवाल यह है की इस सबके लिए दोषी किसको माना जाये ? क्या वे
बच्चे जिन्होंने इस दिन का महत्व समझे बिना मिठाई का आनन्द लिया। क्या वे
पुलिसकर्मी जो कार्यक्रम की देखरेख मे तो लगे है पर यह नहीं जानते की
क्या कार्यक्रम हो रहा है ? क्या वे लोग जो रस्म निभाने के लिए बधाई
सन्देश तो दे रहे है, पर इस दिवस की महत्ता से अनभिज्ञ है ? अपने देश मे
वर्ष मे दो-चार दिन ऐसे आते है जब सभी टीवी चैनल देशभक्ति के गीतों का
प्रसारण करते है, स्वतंत्रता सेनानियों का नाम लेते है। परन्तु सास बहु
एवं रियलिटी शो देखने वाली आज की युवा पीड़ी उन महान स्वतंत्रता
सेनानियों के बारे मे जानना नहीं चाहती। कम से कम युवा पीड़ी के लिए तो
ऐसे कार्यक्रम स्कूल के समय मे दिखाने ही चाहिए, जिससे वो देश के शानदार
इतिहास को जान सके।
अपने देश मे किसी को श्रद्धाजलि देने व किसी का भी जन्मदिन मनाने के लिए
बस छुट्टी कर दी जाती है। कुछ सरकारे वोटबैंक की खातिर हर मजहब के
महापुरुष के जन्म अथवा निर्वाण दिवस पर छुट्टी कर चुनावी लाभ पाने की
असफल कोशिश करते है। जो बच्चे इन विशेष दिनों मे स्कूल नहीं जाते, देश के
जो करोडो कर्मचारी इस छुट्टी के नाम पर घरो मे बैठ जाते है उनका एक फीसदी
भी ऐसा नहीं जो उन महापुरषों के विषय मे जानने का प्रयास करे,जिनके नाम
पर छुट्टी मिलती है।दुनिया के किसी देश मे इतनी छुट्टी नहीं होती है
जितनी भारत मे होती है।
ज्ञान- विज्ञान के नाम पर आज की युवा पीड़ी काफी कुछ जानती है, पर क्या
कोई विश्वास करेगा की लखनऊ मे पैदा हुआ बच्चा बड़ा होकर उसे ये मालूम हो
कि लखनऊ के आखिरी नवाब का नाम क्या था ? इस लिए यह जरुरी है कि
महापुरुषो के जन्मदिन पर छुट्टी संस्कृति को ख़त्म कर देना चाहिए और जिन
महापुरुषो को हम श्रद्धाजलि देना चाहते है उनका जीवन चरित्र देशवासियों को
बताना चाहिए। मेरा मानना है कि देश को आगे ले जाने के लिए छुट्टियों की
छुट्टी कर देनी चाहिए। कम से कम अवकाश और ज्यादा से ज्यादा काम यही देश
को आगे ले जा सकता है।
सुमित गुप्ता


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