Sunday, 12 September 2010

चुनाव का समय हो ...तो नेताओ को जनता से मिलने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता ...नुक्कड़ नाटक का आयोजन ... रेली ...जनसभा ....वगेरह वरेरह ....और इन सबसे जयादा मुश्किल है ....जनता या कहे ..मतदाताओ को सभा तक लाना ...क्योकि अब वो ज़माना गया ...जब लोग नेताओ कि एक जलक पाने के लिए कोसो दूर से पैदल चल कर आ जाते थे .... घंटो तक इंतज़ार किया करते थे ....लेकिन आज के इस भाग दोड भरी ज़िन्दगी मे तो किसी के पास न तो समय है ....और न वो किसी कि जनसभा मे जाने कि दिलचस्पी रखता है ...ज़ाहिर सी बात है कि राजनितिक दल और उनके नेताओ को अपनी बात मतदाताओ तक पहुचने के लिए अपनी रुन्नीति मे भी बदलाव करना पड़ा ....इसके लिए उनोहोने चुनाव के दोरान पड़ने वाले पर्व मे ज्यादा से ज्यादा भागीदारी करना .... जी हां अगर चुनाव मे के बीच मे कोई बड़ा पर्व आ जाए .... फिर क्या नेताओ का तो आधा कम बन गया ....चाहे जितने बिजी हो ...कही भी कभी भी बड़ा जलसा हो पहुच जाते है ... SUMIT GUPTA

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