Wednesday, 28 August 2013


देश की पहले नंबर अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल करेगा उत्तर प्रदेश 




देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश की हैसियत से उत्तर प्रदेश लोकतंत्र और विकास के किसी भी राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ही रहेगा। अभिजात्य अर्थशास्त्रियों ने उत्तर प्रदेश को बीमारू और काऊबेल्ट का भाग बनाकर उपहास का पात्र बनाया था, लेकिन आज वे स्वयं इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए गए हैं। पिछली योजनावधि में उत्तर प्रदेश की विकास दर लक्ष्य से ऊपर रही है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था का देश में दूसरा स्थान है। अगर वर्तमान सरकार ने अपने संकल्प को साकार करने की कोशिशें जारी रखीं तो उत्तार प्रदेश को बहुत खामोशी से देश की पहले नंबर की अर्थव्यवस्था का दर्जा भी मिल सकता है। इस प्रदेश में बहुत ऐसे सकारात्मक तत्व हैं, जिनको अनदेखा किया गया है। विकास के संदर्भ में यह पूरे देश के लिए एक शुभ संकेत होगा।
तेज विकास के लक्ष्य को पाने के लिए उत्तर प्रदेश पूरी तरह से सक्षम है। प्रदेश की एक विचित्र शक्ति यह है कि इसके सभी उप-क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान जरूर है, इसके बाद भी पूरे प्रदेश में असाधारण प्रादेशिक समरसता है। पिछले चुनाव में तो खुद सरकारी दल ने प्रदेश के विभाजन को मुद्दा बनाने का प्रयास किया था, लेकिन इसके बाद भी किसी भी क्षेत्र की जनता ने प्रदेश विभाजन की माग का समर्थन नहीं किया। आश्चर्य का विषय यह है कि उत्तर प्रदेश में कभी भी राष्ट्रीय राजनीति को क्षेत्रीय राजनीति से अलग करके नहीं देखा गया। उत्तार प्रदेश को इस राष्ट्रवादी भावना के कारण काफी नुकसान भी सहना पड़ा।
उत्तर प्रदेश की लोकतात्रिक संस्कृति में सर्वागीण विकास के सूत्र छिपे हैं, लेकिन इन पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। यह प्रदेश स्वतंत्रता मिलने के बाद जमींदारी उन्मूलन के मामले में सबसे आगे रहा है। पूरे देश में यह अकेला प्रदेश है, जहा दलित नेतृत्व के किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिला। यहा साप्रदायिक प्रभाव की बात की जाती है, लेकिन इस पक्ष पर कम ध्यान दिया गया कि प्रदेश के इतिहास में सर्वाधिक मुस्लिम विधायक होने के बाद भी कहीं कोई साप्रदायिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती है। प्रदेश की जनता ने हर संकट के समय स्वस्थ राजनीतिक संकल्प का परिचय दिया है। 1989, 1991, 1993 और 1996 में अस्थिर विधानसभाओं के अनुभव से सीखकर इसी मतदाता ने पिछले दो बार से एक दल को पूर्ण बहुमत दिया है। इन बातों का आशय यह है कि प्रदेश की जनता में और वर्तमान शासन में राजनीतिक परिपक्वकता है। दोनों स्तरों पर विकास की इच्छा दिखती है।
उत्तर प्रदेश के विकास से लोकतंत्र और विकास की सैद्धातिक मान्यता को ठोस व्यवहारिक रूप मिल सकता है। इस संदर्भ में सत्तारूढ़ दल के विकास के विचार की प्रशसा भी होनी चाहिए। इस विकास का दायरा व्यापक है और इसका चेहरा मानवीय है। इसी समझ के कारण प्रदेश सरकार ने कल्याणकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर भी जोर दिया है। प्रदेश को इन कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने होंगे। इसके अतिरिक्त शासन को कृषि की उत्पादकता बढ़ाने पर और पूर्वाचल के आर्थिक पिछड़ेपन को समाप्त करने पर विशेष जोर देना होगा। सर्वागीण विकास के सपने को साकार करने के लिए आवश्यक है कि उत्तार प्रदेश मानवीय विकास सूचकाक के कई संकेतकों को सुधारने के लिए विशेष प्रयास करे। उत्तर प्रदेश का विकास भारतीय लोकतंत्र के आधार को अधिक मजबूत बनाएगा।
सुमित गुप्ता

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