Sunday, 12 September 2010

चुनाव का समय हो ...तो नेताओ को जनता से मिलने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता ...नुक्कड़ नाटक का आयोजन ... रेली ...जनसभा ....वगेरह वरेरह ....और इन सबसे जयादा मुश्किल है ....जनता या कहे ..मतदाताओ को सभा तक लाना ...क्योकि अब वो ज़माना गया ...जब लोग नेताओ कि एक जलक पाने के लिए कोसो दूर से पैदल चल कर आ जाते थे .... घंटो तक इंतज़ार किया करते थे ....लेकिन आज के इस भाग दोड भरी ज़िन्दगी मे तो किसी के पास न तो समय है ....और न वो किसी कि जनसभा मे जाने कि दिलचस्पी रखता है ...ज़ाहिर सी बात है कि राजनितिक दल और उनके नेताओ को अपनी बात मतदाताओ तक पहुचने के लिए अपनी रुन्नीति मे भी बदलाव करना पड़ा ....इसके लिए उनोहोने चुनाव के दोरान पड़ने वाले पर्व मे ज्यादा से ज्यादा भागीदारी करना .... जी हां अगर चुनाव मे के बीच मे कोई बड़ा पर्व आ जाए .... फिर क्या नेताओ का तो आधा कम बन गया ....चाहे जितने बिजी हो ...कही भी कभी भी बड़ा जलसा हो पहुच जाते है ... SUMIT GUPTA

Monday, 19 July 2010

मेरी रेल यात्रा
मै हाल ही मे गोमती एक्सेप्रेस से लखनऊ से नई दिल्ली आ रहा था ...ट्रैन हमेशा की तरह ठसाठस भरी थी बैठना तो दूर खड़े होने के लिए भी जगह न थी शुक्र है की मेरा टिकट बुक था इसलिए मुझे बैठने के लिए सीट मिल गई लेकिन पुरे आठ घंटे मैने केसे गुजरे मे बता नहीं सकता गाड़ी हर जगह पर रूकती सवारी तो कम न होती बल्कि और सवारी चड़ने के लिए एक दूसरे को धक्का देती हुई आगे बदने की कोशिश करती .....
जब गाड़ी इटावा मे पहुची तो एक महिला जिसकी उम्र तक़रीबन ३० साल की थी अपने पांच बच्चो के साथ चड़ी तो चार बच्चे तो लोगो के बीच से निकलते हुए अपने लिए जगह पा ली लेकिन वो महिला जिसके हाथ मे एक बच्चा तथा दूसरे हाथ मे कुछ सामान था वो अपने लिए जगह तलाश रही थी मै उसके चहेरे की बेबशी को काफी देर तक देखता रहा.... उधर दूसरी और यात्री एक दूसरे से लड़ रहे थे ..... ख़ैर गाड़ी चलने दस मिनट तक ये तू तू मै मै चलता रहा फिर सब शांत .....
लेकिन ये द्रश्य मेरी आँखों के सामने रह रह कर आता रहा..... हम बात तो करते है भारत को विकसित देशो के कतार मे खड़ा करने की....आज भारतीय रुपयों का एक प्रतीक चिहन भी बन गया है और हम आईटी. मेडिकल मे अपने आपको एक मजबूत देश मानते है लेकिन क्या वाकई मे हम विकसित देश बन पायेगे ....
किसी भी देश की पहचान वहा की आधारभूत सुविधाओ से होता है आज भी देश की ८०% जनता रेल से यात्रा करती है तो क्यों आजादी के ६२ साल बाद भी हम उन सुविधाओ से वंचित है जिसके हम हक़दार है हर साल रेल मंत्री बजट मे कई रेलगाड़ी चलने की घोश्डा करती है तो कई के फेरे बढाने के लिए कहती है लेकिन हकीकत मे ये सिर्फ घोश्डा बन कर रह जाती है भारतीय रल नेटवर्क अंग्रेजो का बनाया हुआ है आज जिस तेजी से आबादी बढ रही है उस तेजी से रेलवे का विकास नहीं हुआ है ... आजादी के बाद क्या नई रेललाइन बिछाने का कम उस तेजी से हुआ ......आज भी रेल का कम उसी पुरानी तकनिकी से चल रहा है ... इस समय रेल मंत्रालय सिर्फ बाबुओ के भरोसे चल रहा है क्योकि रेल मंत्री ममता बनर्जी आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव मे इतनी व्यस्त है की उनको दिल्ली आने का समय नहीं है वो अपना अधिकाश समय बंगाल मे ही बिताती है .... ये सही है की वो अपनी पार्टी की लीडर है लेकिन इससे रेलवे को कितनी हनी उठानी पड़ रही है ... योजनाए वो अधिकारी बनाते है जिन्होंने कभी भी इन गाडियों में यात्रा नहीं की है और हमारे प्रिये नेता भी हवाई यात्रा को ही ज्यादा तवज्जो देते है यदि गाड़ी से यात्रा करनी भी पड़े तो वो राजधानी जैसी गाडियो का मजा लेते है तो फिर कैसे उनको इसका एहसास होगा की इन गाडियो मे लोगो को किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है यदि वाकई मे रेल मंत्री को आम लोगो की चिंता है तो उनको हर गाड़ी मे जनरल डिब्बो की संख्या बढानी हगी तथा हर १० १५ दिन मे जो रेल हादसे होते है जैसे रेल गाड़ी का पटरी से उतर जाना बम विस्फोट होना आदि तो इसका सबसे बेहतर तरीका है की गाड़ी के आगे एक पायलट ट्रेन को चलाना इससे न सिर्फ बेगुनाह लोग की जन बचेगी बल्कि देश को आर्थिक हनी भी नहीं होगी ....
उदारीकरण के बाद देश मे हर जगह प्राइवेट कम्पनी का प्रवेश बड़े पैमाने पर हुआ है जिससे न सिर्फ लोगो को रोजगार मिला है बल्कि देश का विकास भी हुआ है लेकिन रेलवे मे निजीकरण अभी न के बराबर है ... यदि वाकई मे रेलवे को विकास करना है तो के तहत ही संभव है वर्ना इसी तरह से भारतीय गाड़ी चलती रहेगी .....इंडिया तो आगे बढ जाएगा लेकिन भारत तो पीछे रह जाएगा .....

Thursday, 13 May 2010


साझी विरासत पर कही दाग न लग जाए
अभी कुछ दिन पहले मुझे दिल्ली के चांदनी चोक बाजार जाने का मोका मिला तक़रीबन एक किलोमीटर लम्बे इस बाजार मे मुझे सभी धर्मो के आस्था केंद्र देखने को मिले चाहे वह दिगम्बर जैन लाल मंदिर हो या आर्य समाज मंदिर फतेपुरी माजिद हो या सेण्टर चर्च या सिखों का गुरुद्वरा वहा का नजारा देखकर मुझे अपने ग्रहनगर लखनऊ की याद आ गई... वहा पर भी यदि आप ऐशबाग से हजरतगंज के दो किलोमीटर की दुरी तय करेगे तो आप देखेगे की हिन्दुओ के मंदिर मुस्लिमो का मजिद ओर सिख तथा ईसाईयो के गुरुद्वारा तथा चर्च मिल जाएगे ....लखनऊ मे हिन्दू मुस्लिम भाईचारा हमेशा से बना हुआ है वहा पर कभी भी कोई बड़ा धार्मिक दंगे नहीं हुए दरअसल हमारी सस्कृति मिलीजुली गंगा जमुनी वाली रही है ओर हम सदा से ही यहाँ एक दूसरे के साथ रहते चले आए है चाहे मुस्लमान हो या हिन्दू दोनों ने एक दूसरे का हिन्दू दोनों ने एक दूसरे का साथ दिया है
हालत चाहे जैसे भी हो हा कभी कभार लोगो पर जूनून भारी पड़ जाता है मगर खुदा का शुक्र है की वह ज्यादा दिनों तक नहीं रहता कहा जाता है आजादी से पूर्व बंगाल मे दुर्गा पूजा के अवसर पर मुस्लिम किसान इन आयोजनों मे बड़ी धूमधाम से शामिल हुआ करते थे कोलकाता मे दुर्गा पूजा मे ओर मुंबई मे गणेश्त्सव पर आज भी दोनों समुदाय को साथ साथ देखा जा सकता है लखनऊ मे आज भी मुहेरम के मोके पर ताजियों के जुलुस मे मुस्लिमो के साथ साथ हिन्दू भाइयो की भी शिरकत होती है आजमेर के ख्वाजा चिस्ती के बारे मे कोंन नहीं जनता उनकी दरगाह पर माथा टेकने वालो मे मुसलमानों से कही अधिक गैर मुस्लिम होते है
भारत मे धर्म को लेकर हमेशा कुछ न कुछ चलता ही रहता है धर्म एक निजी मामला है यह आस्था का सवाल है ओर जहा आस्था का मामला होता है वहा विज्ञानं भी कुछ नहीं क़र सकता लेकिन दुर्भाग्य से समाज के कुछ ठेकेदार है जिनका काम ही दंगे भड़काना है हमें ऐसे दूषित मानसिकता से बचना होगा क्योकि हमारी सस्कृति कहती है की हम तो सदा से ही मिलजुल क़र रहने वाले लोग है .........

तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख .......
एस एच कपाडिया ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के पद के रूप में शपथ ले ली... इसी के साथ उनके उपर एक नई जिम्मेदारी आ गई... क्योकि पिछले कई दिनों से न्यायपालिका के उपर कई तरह के आरोप लगे है चाहे वह दिनाकरण का मामला हो ,न्यायपालिका को आरटीई के दयारे में लाने का मामला हो या फिर भ्रस्टाचार... आज न्याय को लेकर भारतीयों के मन से भरोसा हिल रहा है इसका कारण है यह की नयाय मिलने मे देरी ....आज किसी भी मुद्दे पर फ़ेसला आने मे सालोसाल लग जाते है यह नयाय न मिलने के बराबर है अदालतों मे लगभग तीन करोर मामले लंबित है १५ १५ साल तक निर्णय के लिए प्रतीचा करना पड़ता है... हत्या के कुछ मामले मे सुनवाई हुए एक दशक हो जाने पर भी फ़ेसला नहीं मिलता अभी हाल ही मे कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने १५००० रिटायर जजों ओर उन लोगो की नियुक्ति सम्बन्धी एक योजना को मंजूरी दे दी है जो लंबित मामलों को निपटा सके.... इसके बावजूद बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा की फेसले कितने जल्दी आते है... उन हथकंडो मे ही बहुत सा समय व्यर्थ हो जाता है क्योकि निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्य न्यायालय तक एक लम्बी क़ानूनी प्रक्रिया है इसमे से कुछ तो इतनी जटिल है की किसी मुद्दे पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक केस ट्रान्सफर हो जाता है.... इनमे से कुछ प्रमुख मुद्दे है जैसे बाबरी माजिद , १९८४ के दंगे ,कावेरी जल विवाद.... यदि सही मायने मे इस दिशा मे काम करना है तो न्यायक सुधार की सख्त जरुरत है
नये मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल मे कुछ ऐसा करे जिससे न्यायपालिका मे सुधार की आशा की जा सके ये पहल खुद न्यायपालिका को ही करना है की उसकी प्रतिष्ठा को कैसे बचाया जा सके ये सविंधान के लिए भी उपयुक्त होगा की न्यायपालिका मे बाहरी हस्तछेप न के बराबर हो नहीं तो मुझे हिंदी फिल्म दामनी का वो डायलोग याद आता है जिसमे सनी देयोल कहता है की तारीख पे तारीख , तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख .......

Saturday, 1 May 2010

मई दिवस या सिर्फ दिवस
आज दुनिया भर मे एक मई श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है लेकिन ये बहुत दुःख की बात है की विकास की धुरी कहे जाने वाले श्रमिक बेबस ओर लाचार है उनकी स्थति अत्यंत दयानिये है वे मोलिक अवश्क्ताओ से भी वंचित है... २००१ की जनगणना के अनुसार देश में श्रमिको की संख्या करीब ४० करोर है जिनमे से ३१.३ करोर मुख्य श्रमिक है ओर ८.९ करोर सीमांत श्रमिक ...... ...नेशनल संपेल रिसर्च के अनुसार संगठित ओर असंगठित दोनों चैत्रो मे कुल ८.९ करोर लोग है इनमे से लगभग २.६ करोर संगठित चेत्र मे ओर शेष ४३.३ करोर असंगठित चेत्र में है असंगठित श्रमिको से मेरा मतलब उन लोगो से है जो दो वक़्त की रोटी के लिए वो सब काम करते है जो उनको मिल जाता है खेतिहर ,मजदूर रिक्शाचालक, निर्माण मजदूर, छोटे किसान, नोकर आदि असंगठित श्रेणी के श्रमिको मे गिने जाते है.... देश के विकास ओर उनन्ती में गेर संगठित श्रमिको का योगदान इस तथ्य से लगाया जा सकता है की देश के जीडीपी का करीब ६० प्रतिशत गेर संगठित चेत्र में है सिचाई, बिजली परियोजनाओ के निर्माण समेत शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहा इन लोगो का श्रम न लगा हो लेकिन इनके हितो की चिंता न तो सरकार को है न उद्योग जगत को वैसे तो सरकार ने श्रमिको के कल्याण के लिए अनेक योजनाए शुरू की है लेकिन श्रमिको की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है .....गेरसंगठित श्रमिको के हितो को धयान में रखते हुए सरकार ने असंगठित सेक्टर कामगार सामाजिक सुरछा बिल २००८ पास किया था इसका लाभ गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले २३ करोर भूमिहीनों मजदूरो को मिलना था.... पिछले कुछ वर्षो में असंगठित चेत्र के श्रमिको की स्थति के लिए कई आयोग बने तथा इन सभी ने श्रमिको की स्थति ख़राब बताई तथा सरकार से उन लोगो पर विशेष धयान देने को कहा..... रिपोर्ट में ये भी कहा गया है की इन लोगो के न तो काम करने के घटे तय है ओर न ही उनको पूरी मजदूरी दी जाती है देश के करीब ३८ करोर असंगठित कामगारों का जीवन स्तर बद से बदतर है इसलिए सरकार ओर साथ ही साथ उद्योग जगत को ये सोचना चाहिए की इन लोगो के जीवन स्तर को कैसे उपर उठाया जाए तभी मई दिवस बनाना सार्थक होगा अन्यथा ...............

Wednesday, 10 March 2010

तोड़ फोड़ कि राजनीति.......

अभी हाल ही में मुंबई हाई कोर्ट ने शिवसेना के पूर्व विधायक को प्रदर्शन के दोरान एक होटल को शती पहुचाने के लिए उनके उपर पांच लाख रुपएजमा करने को कहा कोर्ट का कहना था कि आन्दोलन और बंद का आयोजन सवेधानिक अधिकार है लेकिन सम्पति को नुकसान पहुचाने और उत्पात मचाने कि इज़ाज़त किसी को नहीं दी जा सकती ये बड़े दुर्भाग्य कि बात है कि आज शायद ही ऐसा कोई दिन जाता हो जब लोग तोड़ फोड़ न करते हो अभी पिछले दिनों तेलंगाना के मुद्दे परआंधप्रदेश में कई दिनों तक सरकारी सम्पति को नुकसान पहुचाया गया उधर मुंबई में शाहरुक की फ्लिम माय नेम इज खान के विरोध में शिवसेना ने मुंबई व आस पास के जिलो में तोड़फोड़ की लेकिन दोनों जगह की राज्य सरकारों ने शुरू में तो मूकदर्शक बनी रही फिर जब मीडिया में ये रिपोर्ट आने लगी तो करवाई के नाम पर चंद लोगो को जेल में डाल गिया गया बस ......
ये बात सिर्फ मुंबई या आंध्र की नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश वेस्ट बंगाल बिहार या कहे देश के सभी राज्यों की है सभी जगह विरोध के नाम पर तोड़ फोड़ होती है आज यदि किसी राजनितिक दल का कोई आन्दोलन या धरना होता है तो जितना जयादा तोड़ फोड़ होती है वो उतना सफल माना जाता है कियोकी वो जानते है की बिना तोड़ फोड़ के उनको मीडिया में जगह नहीं मिलेगी पर इस सवाल का कभी उत्तर नहीं मिलता की जिन लोगो ने ये अपराध किये क्या उन्हें कोई सजा मिली ?
क्या उनकी पहचान हो गई ? क्या उनमे से कोई जेल की सलाखों के पीछे पंहुचा ? लोगो को अब यह विश्वाश हो गया है की भीड़ के रूप में इक्क्ठे होकर जो कुछ भी किया जाई उसकी सजा नहीं मिलेगी इसीलिये हर साल अपने देश में अरबो रुपए की सम्पति फूक दी जाती है वैसे यह गुस्सा भी खास किस्म का होता है क्या कभी किसी ने सरकार से गुस्सा होकर अपने घर में आग लगाई है या अपनी कार तोड़ी है आज यदि कही पे तोड़फोड़ होता है तो सरकार कुछ नहीं करती कियोकी उसे डरहै की कही उसका वोट बैंक न खिसक जाये आज यदि किसी बात पर छात्रों को गुस्सा आता है तो वे कॉलेज के भवन वाहन आदि में आग लगा देते है रोगियों के परिजन हॉस्पिटल के भवन और अन्य वस्तुओ को नुकसान पहुचाते है लेकिन इससे हानि किसको होती है उस आम जनता को जो इसका उपयोग करती है आज बसों में कोई मंत्री नहीं बैठता या सरकारी हॉस्पिटल में कोई आमिर आदमी नहीं जाता है .......
जाता है तो सिर्फ ओर सिर्फ हमारे जेसे आम आदमी .......तो फिर कियो हम अपनी सम्पति को नुकसान पहुचाये लेकिन जिस तरह से मुंबई हाई कोर्ट ने ये फेसला दिया है इससे इस बात की आशा कि जा सकती है कि यदि न्यायालय के साथ साथ सरकार भी थोडा सख्ती से पेश आये तो इस तोड़ फोड़ से निजाज़ मिल सकता है .............

बोलो लेकिन सोच समझकर

यदि कोई मुझसे पूछे की राखी सावंत व बंगलादेशी लेखिका तेस्लिमा नसरीन में क्या समानता हे तो मेरा जवाब होगा की दोनों को पता हे की मीडिया में किस तरह से जगह बनाई जाती हे जिस प्रकार राखी सावंत जब तब कोई ऐसा बखेड़ा खड़ा क़र देती हे या यू कहे कोई ऐसी बात बोल देती हे जिससे वो मीडिया विशेषकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया के केंद्र में आ जाती हे ठीक उसी प्रकार तेस्लिमा नसरीन समय समय पर कोई ऐसा लेख लिखती हे या बोलती हे जिससे समाज के एक वर्ग विशेष को नागवार गुजरता हे अभी हाल ही में उनके नाम से एक कन्नड़ अख़बार में एक लेख लिखा जिसमे मुस्लिम महिलाओ के बुरखा सम्बन्धी बयान का जिक्र किया गया हे हालाकि उन्होंने इस लेख से किनारा क़र लिया हे मै इस बात मै नहीं जाउगा कि ये लेख सही हे या गलत लेकिन एक बात तो सही हे कि बिना चिंगारी के आग नहीं लगती ये पहेली बार नहीं हे कि किसी मुद्दे पर उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया हो
वह एक प्रखर लेखिका हें लेकिन उनको इस बात का एहसास होना चाहिए कि उनका एक एक शब्द समाज मै बड़ा असर डालता हें वो पिछले कई वर्षो से भारत में रह रही हें क्योकि बंगलादेश की सरकार ने उनको देश निकला दे दिया हें इसलिये वो अब भारत को ही अपना घर मानती हें लेकिन इसके साथ ही साथ उनसे ये अपेछा की जाती हें कि वो ऐसा कोई काम न करे जिससे भारत कि सामाजिक व धार्मिक सद्भ्वाना को किसी भी तरह का कोई असर पड़े