Thursday, 13 May 2010


साझी विरासत पर कही दाग न लग जाए
अभी कुछ दिन पहले मुझे दिल्ली के चांदनी चोक बाजार जाने का मोका मिला तक़रीबन एक किलोमीटर लम्बे इस बाजार मे मुझे सभी धर्मो के आस्था केंद्र देखने को मिले चाहे वह दिगम्बर जैन लाल मंदिर हो या आर्य समाज मंदिर फतेपुरी माजिद हो या सेण्टर चर्च या सिखों का गुरुद्वरा वहा का नजारा देखकर मुझे अपने ग्रहनगर लखनऊ की याद आ गई... वहा पर भी यदि आप ऐशबाग से हजरतगंज के दो किलोमीटर की दुरी तय करेगे तो आप देखेगे की हिन्दुओ के मंदिर मुस्लिमो का मजिद ओर सिख तथा ईसाईयो के गुरुद्वारा तथा चर्च मिल जाएगे ....लखनऊ मे हिन्दू मुस्लिम भाईचारा हमेशा से बना हुआ है वहा पर कभी भी कोई बड़ा धार्मिक दंगे नहीं हुए दरअसल हमारी सस्कृति मिलीजुली गंगा जमुनी वाली रही है ओर हम सदा से ही यहाँ एक दूसरे के साथ रहते चले आए है चाहे मुस्लमान हो या हिन्दू दोनों ने एक दूसरे का हिन्दू दोनों ने एक दूसरे का साथ दिया है
हालत चाहे जैसे भी हो हा कभी कभार लोगो पर जूनून भारी पड़ जाता है मगर खुदा का शुक्र है की वह ज्यादा दिनों तक नहीं रहता कहा जाता है आजादी से पूर्व बंगाल मे दुर्गा पूजा के अवसर पर मुस्लिम किसान इन आयोजनों मे बड़ी धूमधाम से शामिल हुआ करते थे कोलकाता मे दुर्गा पूजा मे ओर मुंबई मे गणेश्त्सव पर आज भी दोनों समुदाय को साथ साथ देखा जा सकता है लखनऊ मे आज भी मुहेरम के मोके पर ताजियों के जुलुस मे मुस्लिमो के साथ साथ हिन्दू भाइयो की भी शिरकत होती है आजमेर के ख्वाजा चिस्ती के बारे मे कोंन नहीं जनता उनकी दरगाह पर माथा टेकने वालो मे मुसलमानों से कही अधिक गैर मुस्लिम होते है
भारत मे धर्म को लेकर हमेशा कुछ न कुछ चलता ही रहता है धर्म एक निजी मामला है यह आस्था का सवाल है ओर जहा आस्था का मामला होता है वहा विज्ञानं भी कुछ नहीं क़र सकता लेकिन दुर्भाग्य से समाज के कुछ ठेकेदार है जिनका काम ही दंगे भड़काना है हमें ऐसे दूषित मानसिकता से बचना होगा क्योकि हमारी सस्कृति कहती है की हम तो सदा से ही मिलजुल क़र रहने वाले लोग है .........

तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख .......
एस एच कपाडिया ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के पद के रूप में शपथ ले ली... इसी के साथ उनके उपर एक नई जिम्मेदारी आ गई... क्योकि पिछले कई दिनों से न्यायपालिका के उपर कई तरह के आरोप लगे है चाहे वह दिनाकरण का मामला हो ,न्यायपालिका को आरटीई के दयारे में लाने का मामला हो या फिर भ्रस्टाचार... आज न्याय को लेकर भारतीयों के मन से भरोसा हिल रहा है इसका कारण है यह की नयाय मिलने मे देरी ....आज किसी भी मुद्दे पर फ़ेसला आने मे सालोसाल लग जाते है यह नयाय न मिलने के बराबर है अदालतों मे लगभग तीन करोर मामले लंबित है १५ १५ साल तक निर्णय के लिए प्रतीचा करना पड़ता है... हत्या के कुछ मामले मे सुनवाई हुए एक दशक हो जाने पर भी फ़ेसला नहीं मिलता अभी हाल ही मे कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने १५००० रिटायर जजों ओर उन लोगो की नियुक्ति सम्बन्धी एक योजना को मंजूरी दे दी है जो लंबित मामलों को निपटा सके.... इसके बावजूद बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा की फेसले कितने जल्दी आते है... उन हथकंडो मे ही बहुत सा समय व्यर्थ हो जाता है क्योकि निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्य न्यायालय तक एक लम्बी क़ानूनी प्रक्रिया है इसमे से कुछ तो इतनी जटिल है की किसी मुद्दे पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक केस ट्रान्सफर हो जाता है.... इनमे से कुछ प्रमुख मुद्दे है जैसे बाबरी माजिद , १९८४ के दंगे ,कावेरी जल विवाद.... यदि सही मायने मे इस दिशा मे काम करना है तो न्यायक सुधार की सख्त जरुरत है
नये मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल मे कुछ ऐसा करे जिससे न्यायपालिका मे सुधार की आशा की जा सके ये पहल खुद न्यायपालिका को ही करना है की उसकी प्रतिष्ठा को कैसे बचाया जा सके ये सविंधान के लिए भी उपयुक्त होगा की न्यायपालिका मे बाहरी हस्तछेप न के बराबर हो नहीं तो मुझे हिंदी फिल्म दामनी का वो डायलोग याद आता है जिसमे सनी देयोल कहता है की तारीख पे तारीख , तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख .......

Saturday, 1 May 2010

मई दिवस या सिर्फ दिवस
आज दुनिया भर मे एक मई श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है लेकिन ये बहुत दुःख की बात है की विकास की धुरी कहे जाने वाले श्रमिक बेबस ओर लाचार है उनकी स्थति अत्यंत दयानिये है वे मोलिक अवश्क्ताओ से भी वंचित है... २००१ की जनगणना के अनुसार देश में श्रमिको की संख्या करीब ४० करोर है जिनमे से ३१.३ करोर मुख्य श्रमिक है ओर ८.९ करोर सीमांत श्रमिक ...... ...नेशनल संपेल रिसर्च के अनुसार संगठित ओर असंगठित दोनों चैत्रो मे कुल ८.९ करोर लोग है इनमे से लगभग २.६ करोर संगठित चेत्र मे ओर शेष ४३.३ करोर असंगठित चेत्र में है असंगठित श्रमिको से मेरा मतलब उन लोगो से है जो दो वक़्त की रोटी के लिए वो सब काम करते है जो उनको मिल जाता है खेतिहर ,मजदूर रिक्शाचालक, निर्माण मजदूर, छोटे किसान, नोकर आदि असंगठित श्रेणी के श्रमिको मे गिने जाते है.... देश के विकास ओर उनन्ती में गेर संगठित श्रमिको का योगदान इस तथ्य से लगाया जा सकता है की देश के जीडीपी का करीब ६० प्रतिशत गेर संगठित चेत्र में है सिचाई, बिजली परियोजनाओ के निर्माण समेत शायद ही कोई ऐसी जगह हो जहा इन लोगो का श्रम न लगा हो लेकिन इनके हितो की चिंता न तो सरकार को है न उद्योग जगत को वैसे तो सरकार ने श्रमिको के कल्याण के लिए अनेक योजनाए शुरू की है लेकिन श्रमिको की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है .....गेरसंगठित श्रमिको के हितो को धयान में रखते हुए सरकार ने असंगठित सेक्टर कामगार सामाजिक सुरछा बिल २००८ पास किया था इसका लाभ गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले २३ करोर भूमिहीनों मजदूरो को मिलना था.... पिछले कुछ वर्षो में असंगठित चेत्र के श्रमिको की स्थति के लिए कई आयोग बने तथा इन सभी ने श्रमिको की स्थति ख़राब बताई तथा सरकार से उन लोगो पर विशेष धयान देने को कहा..... रिपोर्ट में ये भी कहा गया है की इन लोगो के न तो काम करने के घटे तय है ओर न ही उनको पूरी मजदूरी दी जाती है देश के करीब ३८ करोर असंगठित कामगारों का जीवन स्तर बद से बदतर है इसलिए सरकार ओर साथ ही साथ उद्योग जगत को ये सोचना चाहिए की इन लोगो के जीवन स्तर को कैसे उपर उठाया जाए तभी मई दिवस बनाना सार्थक होगा अन्यथा ...............