मेरी रेल यात्रा
मै हाल ही मे गोमती एक्सेप्रेस से लखनऊ से नई दिल्ली आ रहा था ...ट्रैन हमेशा की तरह ठसाठस भरी थी बैठना तो दूर खड़े होने के लिए भी जगह न थी शुक्र है की मेरा टिकट बुक था इसलिए मुझे बैठने के लिए सीट मिल गई लेकिन पुरे आठ घंटे मैने केसे गुजरे मे बता नहीं सकता गाड़ी हर जगह पर रूकती सवारी तो कम न होती बल्कि और सवारी चड़ने के लिए एक दूसरे को धक्का देती हुई आगे बदने की कोशिश करती .....
जब गाड़ी इटावा मे पहुची तो एक महिला जिसकी उम्र तक़रीबन ३० साल की थी अपने पांच बच्चो के साथ चड़ी तो चार बच्चे तो लोगो के बीच से निकलते हुए अपने लिए जगह पा ली लेकिन वो महिला जिसके हाथ मे एक बच्चा तथा दूसरे हाथ मे कुछ सामान था वो अपने लिए जगह तलाश रही थी मै उसके चहेरे की बेबशी को काफी देर तक देखता रहा.... उधर दूसरी और यात्री एक दूसरे से लड़ रहे थे ..... ख़ैर गाड़ी चलने दस मिनट तक ये तू तू मै मै चलता रहा फिर सब शांत .....
लेकिन ये द्रश्य मेरी आँखों के सामने रह रह कर आता रहा..... हम बात तो करते है भारत को विकसित देशो के कतार मे खड़ा करने की....आज भारतीय रुपयों का एक प्रतीक चिहन भी बन गया है और हम आईटी. मेडिकल मे अपने आपको एक मजबूत देश मानते है लेकिन क्या वाकई मे हम विकसित देश बन पायेगे ....
किसी भी देश की पहचान वहा की आधारभूत सुविधाओ से होता है आज भी देश की ८०% जनता रेल से यात्रा करती है तो क्यों आजादी के ६२ साल बाद भी हम उन सुविधाओ से वंचित है जिसके हम हक़दार है हर साल रेल मंत्री बजट मे कई रेलगाड़ी चलने की घोश्डा करती है तो कई के फेरे बढाने के लिए कहती है लेकिन हकीकत मे ये सिर्फ घोश्डा बन कर रह जाती है भारतीय रल नेटवर्क अंग्रेजो का बनाया हुआ है आज जिस तेजी से आबादी बढ रही है उस तेजी से रेलवे का विकास नहीं हुआ है ... आजादी के बाद क्या नई रेललाइन बिछाने का कम उस तेजी से हुआ ......आज भी रेल का कम उसी पुरानी तकनिकी से चल रहा है ... इस समय रेल मंत्रालय सिर्फ बाबुओ के भरोसे चल रहा है क्योकि रेल मंत्री ममता बनर्जी आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव मे इतनी व्यस्त है की उनको दिल्ली आने का समय नहीं है वो अपना अधिकाश समय बंगाल मे ही बिताती है .... ये सही है की वो अपनी पार्टी की लीडर है लेकिन इससे रेलवे को कितनी हनी उठानी पड़ रही है ... योजनाए वो अधिकारी बनाते है जिन्होंने कभी भी इन गाडियों में यात्रा नहीं की है और हमारे प्रिये नेता भी हवाई यात्रा को ही ज्यादा तवज्जो देते है यदि गाड़ी से यात्रा करनी भी पड़े तो वो राजधानी जैसी गाडियो का मजा लेते है तो फिर कैसे उनको इसका एहसास होगा की इन गाडियो मे लोगो को किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है यदि वाकई मे रेल मंत्री को आम लोगो की चिंता है तो उनको हर गाड़ी मे जनरल डिब्बो की संख्या बढानी हगी तथा हर १० १५ दिन मे जो रेल हादसे होते है जैसे रेल गाड़ी का पटरी से उतर जाना बम विस्फोट होना आदि तो इसका सबसे बेहतर तरीका है की गाड़ी के आगे एक पायलट ट्रेन को चलाना इससे न सिर्फ बेगुनाह लोग की जन बचेगी बल्कि देश को आर्थिक हनी भी नहीं होगी ....
उदारीकरण के बाद देश मे हर जगह प्राइवेट कम्पनी का प्रवेश बड़े पैमाने पर हुआ है जिससे न सिर्फ लोगो को रोजगार मिला है बल्कि देश का विकास भी हुआ है लेकिन रेलवे मे निजीकरण अभी न के बराबर है ... यदि वाकई मे रेलवे को विकास करना है तो के तहत ही संभव है वर्ना इसी तरह से भारतीय गाड़ी चलती रहेगी .....इंडिया तो आगे बढ जाएगा लेकिन भारत तो पीछे रह जाएगा .....
जब गाड़ी इटावा मे पहुची तो एक महिला जिसकी उम्र तक़रीबन ३० साल की थी अपने पांच बच्चो के साथ चड़ी तो चार बच्चे तो लोगो के बीच से निकलते हुए अपने लिए जगह पा ली लेकिन वो महिला जिसके हाथ मे एक बच्चा तथा दूसरे हाथ मे कुछ सामान था वो अपने लिए जगह तलाश रही थी मै उसके चहेरे की बेबशी को काफी देर तक देखता रहा.... उधर दूसरी और यात्री एक दूसरे से लड़ रहे थे ..... ख़ैर गाड़ी चलने दस मिनट तक ये तू तू मै मै चलता रहा फिर सब शांत .....
लेकिन ये द्रश्य मेरी आँखों के सामने रह रह कर आता रहा..... हम बात तो करते है भारत को विकसित देशो के कतार मे खड़ा करने की....आज भारतीय रुपयों का एक प्रतीक चिहन भी बन गया है और हम आईटी. मेडिकल मे अपने आपको एक मजबूत देश मानते है लेकिन क्या वाकई मे हम विकसित देश बन पायेगे ....
किसी भी देश की पहचान वहा की आधारभूत सुविधाओ से होता है आज भी देश की ८०% जनता रेल से यात्रा करती है तो क्यों आजादी के ६२ साल बाद भी हम उन सुविधाओ से वंचित है जिसके हम हक़दार है हर साल रेल मंत्री बजट मे कई रेलगाड़ी चलने की घोश्डा करती है तो कई के फेरे बढाने के लिए कहती है लेकिन हकीकत मे ये सिर्फ घोश्डा बन कर रह जाती है भारतीय रल नेटवर्क अंग्रेजो का बनाया हुआ है आज जिस तेजी से आबादी बढ रही है उस तेजी से रेलवे का विकास नहीं हुआ है ... आजादी के बाद क्या नई रेललाइन बिछाने का कम उस तेजी से हुआ ......आज भी रेल का कम उसी पुरानी तकनिकी से चल रहा है ... इस समय रेल मंत्रालय सिर्फ बाबुओ के भरोसे चल रहा है क्योकि रेल मंत्री ममता बनर्जी आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव मे इतनी व्यस्त है की उनको दिल्ली आने का समय नहीं है वो अपना अधिकाश समय बंगाल मे ही बिताती है .... ये सही है की वो अपनी पार्टी की लीडर है लेकिन इससे रेलवे को कितनी हनी उठानी पड़ रही है ... योजनाए वो अधिकारी बनाते है जिन्होंने कभी भी इन गाडियों में यात्रा नहीं की है और हमारे प्रिये नेता भी हवाई यात्रा को ही ज्यादा तवज्जो देते है यदि गाड़ी से यात्रा करनी भी पड़े तो वो राजधानी जैसी गाडियो का मजा लेते है तो फिर कैसे उनको इसका एहसास होगा की इन गाडियो मे लोगो को किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है यदि वाकई मे रेल मंत्री को आम लोगो की चिंता है तो उनको हर गाड़ी मे जनरल डिब्बो की संख्या बढानी हगी तथा हर १० १५ दिन मे जो रेल हादसे होते है जैसे रेल गाड़ी का पटरी से उतर जाना बम विस्फोट होना आदि तो इसका सबसे बेहतर तरीका है की गाड़ी के आगे एक पायलट ट्रेन को चलाना इससे न सिर्फ बेगुनाह लोग की जन बचेगी बल्कि देश को आर्थिक हनी भी नहीं होगी ....
उदारीकरण के बाद देश मे हर जगह प्राइवेट कम्पनी का प्रवेश बड़े पैमाने पर हुआ है जिससे न सिर्फ लोगो को रोजगार मिला है बल्कि देश का विकास भी हुआ है लेकिन रेलवे मे निजीकरण अभी न के बराबर है ... यदि वाकई मे रेलवे को विकास करना है तो के तहत ही संभव है वर्ना इसी तरह से भारतीय गाड़ी चलती रहेगी .....इंडिया तो आगे बढ जाएगा लेकिन भारत तो पीछे रह जाएगा .....
